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VOL. 11, ISSUE 2 (2026)
प्रेमचन्द के उपन्यासों में ग्रामीण जीवन का चित्रण
Authors
प्रभा टेटे
Abstract
Premchand हिन्दी साहित्य के ऐसे महान साहित्यकार हैं जिन्होंने भारतीय समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में अत्यंत संवेदनशीलता और गहराई के साथ प्रस्तुत किया। उन्हें “उपन्यास सम्राट” कहा जाता है क्योंकि उन्होंने हिन्दी उपन्यास को सामाजिक यथार्थ और जनजीवन से जोड़ा। प्रेमचन्द के साहित्य में भारतीय समाज का हर वर्ग उपस्थित है, किन्तु ग्रामीण जीवन का चित्रण उनकी रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता है। भारत मूलतः गाँवों का देश रहा है और प्रेमचन्द ने गाँवों की गरीबी, किसानों की समस्याएँ, सामाजिक विषमताएँ, स्त्रियों की दशा, धार्मिक आडम्बर तथा शोषण को अपने उपन्यासों में जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।
प्रेमचन्द का जन्म एक ग्रामीण परिवेश में हुआ था। उन्होंने किसानों और मजदूरों के जीवन को निकट से देखा था। यही कारण है कि उनके साहित्य में ग्रामीण जीवन का चित्रण अत्यंत यथार्थवादी और मार्मिक बन पड़ा है। उनके उपन्यास केवल कहानी नहीं हैं, बल्कि भारतीय समाज का सामाजिक दस्तावेज हैं। उन्होंने ग्रामीण जीवन के सुख-दुःख, संघर्ष, मानवीय संबंधों और सामाजिक परिवर्तन की चेतना को अपनी लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्त किया।
प्रेमचन्द के प्रमुख उपन्यास जैसे गोदान, निर्मला, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कर्मभूमि आदि में ग्रामीण समाज की समस्याओं का व्यापक चित्रण मिलता है। उनके साहित्य में गाँव केवल पृष्ठभूमि नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों के प्रतीक बनकर उभरते हैं। प्रेमचन्द ने किसानों की आर्थिक दुर्दशा, जमींदारी प्रथा के अत्याचार, महाजनी शोषण और सामाजिक कुरीतियों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया है।
यह शोध लेख प्रेमचन्द के उपन्यासों में ग्रामीण जीवन के विभिन्न पक्षों का अध्ययन प्रस्तुत करता है। इसमें किसानों की स्थिति, ग्रामीण स्त्रियों की भूमिका, सामाजिक समस्याएँ, आर्थिक शोषण, ग्रामीण संस्कृति तथा प्रेमचन्द के यथार्थवाद का विश्लेषण किया जाएगा।

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Pages:78-79
How to cite this article:
प्रभा टेटे "प्रेमचन्द के उपन्यासों में ग्रामीण जीवन का चित्रण". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 11, Issue 2, 2026, Pages 78-79
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