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VOL. 9, ISSUE 2 (2024)
स्वतंत्र व्यापार नीति का महत्त्व एवं अर्द्धविकसित देशों पर उसका प्रभाव
Authors
सरिता
Abstract
स्वतंत्र व्यापार नीति, जो विभिन्न देशों के मध्य वस्तुओं एवं सेवाओं के विनिमय पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं लगाती, स्वतंत्र व्यापार नीति के नाम से जानी जाती है। एडम स्मिथ के अनुसार स्वतंत्र व्यापार नीति की धारणा का संबंध ‘‘एक ऐसी वाणिज्य नीति से है जो घरेलू और विदेशी वस्तुओं के मध्य किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करती है तथा जो न तो घरेलू वस्तु को किसी प्रकार की विशेष छूट देती है और न विदेशी वस्तु पर कोई अतिरिक्त भार डालती है।’’ इस प्रकार स्वतंत्र व्यापार नीति किसी कृत्रिम बाधा को उत्पन्न किए बिना वस्तुओं और सेवाओं के अन्तर्राष्ट्रीय प्रवाह को स्वीकृति प्रदान करती है। फिर भी स्वतंत्र व्यापार नीति के लिए यह आवश्यक नहीं है कि आयातों अथवा निर्यातों पर किसी प्रकार के प्रतिबंध न हो। स्वतंत्र व्यापार के अंतर्गत कर तो लगाए जाते हैं किंतु उनका अभिप्राय केवल आय प्राप्त करना होता है, सरंक्षण देना या भेदभाव करना नहीं होता। 18वी ंतथा 19वीं शताब्दी में स्वतंत्र व्यापार के पक्ष में दिए गए तर्क व्यक्तिवाद के दर्शन पर आधारित थे। जिसकी अभिव्यक्ति जॉन लॉक, डेविड ह्यूम एवं एडम स्मिथ विद्वानों के लेखों में पाई जाती है। एड्म स्मिथ ने व्यक्तिवादियों की व्यापारिक नीति का यह तर्क प्रस्तुत करते हुए कटु आलोचना की थी कि स्वतंत्र व्यापार के कारण व्यापार में सलंग्न राष्ट्र अपनी समृद्धि में वृद्धि करने में सफल होते हैं क्योंकि व्यापार के कारण श्रम विभाजन और विशिष्टीकरण संभव हो जाता है और ये दोनों सम्मिलित होकर व्यापार से लाभ के द्वार को खोलते हैं। स्मिथ ने कड़े परिश्रम के बाद यह दिखलाया कि श्रम विभाजन द्वारा प्राप्त लाभ की सीमा बाजार के विस्तार पर निर्भर करती है।
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Pages:7-8
How to cite this article:
सरिता "स्वतंत्र व्यापार नीति का महत्त्व एवं अर्द्धविकसित देशों पर उसका प्रभाव". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 9, Issue 2, 2024, Pages 7-8
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