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VOL. 9, ISSUE 1 (2024)
भारतीय दर्शन परम्परा में वेदों की सार्वभेोमिकता
Authors
सचिन भारद्धाज, डॉ. अरूण कुमार साव
Abstract
वेद को प्रामाणिक मानने वाले दर्शन को ’आस्तिक’ तथा वेद को अप्रमाणिक मानने वाले दर्शन को ’नास्तिक’ कहा जाता है। आस्तिक दर्शन छः हैं जिन्हें न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त कहा जाता है। इनके विपरीत चावार्क, बौद्ध और जैन दर्शनों को ’नास्तिक दर्शन’ के वर्ग में रखा जाता है। इन दर्शनों में कुछ आपसी विभिन्नता है। किन्तु मतभेदों के बाद भी इन दर्शनों में सर्वनिष्ठता का भाव छिपा है। कुछ समान सिद्धांतों की प्रमाणिकता प्रत्येक दर्शन में उपलब्ध है। इस समानता के कारण प्रत्येक दर्शन का विकास एक ही भूमि भारत में हुआ, ये कहा जा सकता है। एक ही देश में पनपने के कारण इन दर्शनों पर भारतीय प्रतिभा, निष्ठा और संस्कृति की छाप अमिट रूप से पड़ गई है। इस प्रकार भारत के विभिन्न दर्शनों में जो सामानताएँ दिखाई देती हैं, उसे भारतीय दर्शन की विशेषताएँ कहा जाता है।
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Pages:16-18
How to cite this article:
सचिन भारद्धाज, डॉ. अरूण कुमार साव "भारतीय दर्शन परम्परा में वेदों की सार्वभेोमिकता". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 9, Issue 1, 2024, Pages 16-18
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