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VOL. 9, ISSUE 1 (2024)
समग्र स्वास्थ्य में गीतोक्त कर्मयोग की उपयोगिता
Authors
देवेश कुमार
Abstract
हम सभी कुछ न कुछ कर्म करते रहते हैं। हम बिना कर्म किए रह नहीं पाते हम प्रत्येक क्षण कर्म करते रहते हैं। जिन कर्मों को करते समय हमारा मन व भावनाएं जुड़ जाती हैं वो संस्कार के रूप मे एकत्र हो जाते हैं जिन्हें महर्षि पतंजलि ने विपाक नाम दिया है। उनका फल हमें भोगना ही पड़ता है। निकृष्ट कर्मों का परिणाम निकृष्ट फल के रूप में सामने आता है और उत्कृष्ट कर्मों का फल उन्नति प्रदान करने वाला होता है। संसार में जितने भी प्राणी हैं सभी कुछ न कुछ कर्म करते रहते हैं। ऐसे ही मनुष्य भी निरंतर कर्म करने में लगा रहता है सुबह जागरण के बाद से रात्रि में शयन तक हम कर्म करते रहते हैं। हम हर समय कोई न कोई कर्म करते रहते हैं कर्म करना हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति है। हम जो भी कर्म करते हैं उसका फल अवश्य भोगना पड़ता है और जो व्यक्ति कर्म करता है उसे ही उसका फल भोगना होता है किसी दूसरे को नहीं। इसलिए हमें ऐसे कर्म करने चाहिए जिससे हमें दुख न हो, सांसारिक बंधन में न बांधते हों, समग्र स्वास्थ्य प्रदान करने वाले हों। हमें शास्त्रों के अनुरूप ही कर्म करने चाहिए। प्रस्तुत शोध पत्र में बताया गया है कि भगवद्गीतोक्त कर्मों को करने से किस प्रकार समग्र स्वास्थ्य प्राप्त किया जा सकता है।
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Pages:21-23
How to cite this article:
देवेश कुमार "समग्र स्वास्थ्य में गीतोक्त कर्मयोग की उपयोगिता". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 9, Issue 1, 2024, Pages 21-23
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