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VOL. 6, ISSUE 1 (2021)
कौटिल्य का मण्ड़ल सिद्धान्त
Authors
डा. मनीषा दीवान
Abstract
भारतीय राजाओं के सम्मुख एकराट् बनने का आदर्श वैदिककाल से ही चला आ रहा है। दिग्विजय की इच्छा रखने वाला राजा आत्मरक्षा के लिये व शत्रु को पराजित करने के अभिप्राय से अपने पड़ौसी राज्यों से परस्पर मैत्री सम्बन्ध भी स्थापित करता था। अतः हमारे राजनैतिक चिन्तकों ने अन्तर-राज्यीय नीति के कुछ सिद्धान्त प्रतिपादित किये इनमें से एक प्रमुख सिद्धान्त है-मण्ड़ल सिद्धान्त। इस प्रकार दिग्विजय की अवधारणा ने इस सिद्धान्त को जन्म दिया।
मण्ड़ल सिद्धान्त कब प्रतिपादित किया गया यह निश्चित करना कठिन है वैदिक साहित्य में राजमण्ड़ल का उल्लेख नहीं है। रामायण से भी इस पर कोई प्रकाश नहीं पड़ता। हाँ महाभारत में इस सिद्धान्त का यत्र-तत्र विवरण मिलता है। महाभारत के सभा पर्व, आश्रमवासिक पर्व व शान्ति पर्व में इसका उल्लेख है।
महाभारत के शान्ति पर्व में ’’द्वादश मण्ड़ल उससे सम्बन्धित 72 विचारणीय एवं प्रतिकार योग्य विषयों का उल्लेख मिलता है।’’1
मनु ने भी मण्ड़ल या राजमण्ड़ल की सम्यक विवेचना की है। उनके अनुसार ’’विष्व में मण्ड़ल में बारह प्रकृतियाँ होती है।’’2
कामन्दक ने अपने ’’नीतिसार ग्रन्थ’’ में पूर्वाचार्याे के मतों को व्यक्त करते हुए स्वयं द्वादश मण्ड़ल को मान्यता दी है। 3
मण्ड़ल सिद्धान्त का शास्त्रीय विवेचन कौटिल्य के अर्थशास्त्र के छठे अधिकरण के दूसरे अध्याय में मिलता है।
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Pages:26-28
How to cite this article:
डा. मनीषा दीवान "कौटिल्य का मण्ड़ल सिद्धान्त". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 6, Issue 1, 2021, Pages 26-28
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