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VOL. 3, ISSUE 1 (2018)
मीरा के प्रेम दर्शन में वैश्म्य
Authors
अनुपम शर्मा, डाॅ0 तबस्सुम खान
Abstract
प्रेम मानवीय संरचना का एक प्रधान तत्व है सम्पूर्ण मानव में इसी प्रेम का विस्तार है। यह प्रेम ही है जो विभिन्न सन्दर्भ और दिशायं ग्रहण करता हुआ जीवन को एक रचनात्मक स्वरूप प्रदान करता है। प्रेम ही निषेधात्मक दिशाएँ ग्रहण करके जीवन में विघटनकारी प्रवर्तियों को जन्म देता है। तात्विक रूप से प्रेम का शाश्घत और सामान्य मनोवृति और श्रीहर मनुष्य में बल्कि मनुष्य में नहीं जीवन की चेतना पर संस्कार रूप में विधामान रहती है इस आधार पर प्रेम का विकास एक सा होना चाहिए। प्रेम-दर्शनपरक द्रष्टि एक सी होनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता। मनोवॅज्ञानिक सत्य है कि मनोवतिया सन्दर्भ सापेक्ष होकर व्यक्ति चेतना के लिए व्यवाहरिक दाचा तेयार करती है व्यक्ति चेतना व्यावहारिक ढांचा ही उस व्यक्ति का अपना दर्शन बन जाता है। यही दर्शन जीवन साधना के रूप में उसकी अनुभूति का आधार बनता हैं।
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Pages:1339-1340
How to cite this article:
अनुपम शर्मा, डाॅ0 तबस्सुम खान "मीरा के प्रेम दर्शन में वैश्म्य". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 3, Issue 1, 2018, Pages 1339-1340
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