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VOL. 1, ISSUE 4 (2016)
गोदान में नारी चरित्र
Authors
डॉ. रीता शुक्ला
Abstract
'गोदान में गाँव की समाजार्थिक व्यवस्था की घुरी के तौर पर किसान की पहचान केंद्रीय स्थिति के रूप में सामने आई है। यहाँ होरी
को केंद्रीय पात्र के रूप में प्रेमचंद ने चित्रित किया है। होरी की हार एक व्यक्ति की ही हार
नहीं है, बल्कि
ग्रामीण संस्कृति और
सामंती संस्कृति की हार है। महाजनी सभ्यता के सामने होरी जैसे किसान बेबस और ज़मींदार लाचार है। ज़मींदारों के लिए तो उनके
उच्चस्तरीय संबंधों के कारण कुछ राहत तो है लेकिन गरीब किसानों के लिए उनकी जमीन का छीन लिया जाना लगभग मृत्यु के समान है। होरी अपनी पाँच बीधे मौरूसी जमीन
उसके लाख प्रयत्नों के बावजूद बचा नहीं पाता। बार-बार लिए गए कर्ज के बदले, लगान चुकाने के ऐवज में धीरे-धीरे उसकी जमीन महाजन और ज़मींदारों की भेट हो जाती है।
होरी के इस जीवन संघर्ष में उसकी पत्नी धनिया का बराबर का साथ है। प्रेमचंद होरी का चरित्र दब्बू, ढीला-ढाला, धर्मभीरू दिखाते है तो धनिया को निडर, स्वाभिमानी, मेहनती और साहसी चित्रित करते हैं। आधुनिक विचारधारा के प्रवर्तक प्रेमचंद होरी के संघर्ष को अकेले के
संघर्ष के रूप में नहीं
बल्कि होरी-धनिया के सांझा संघर्ष के रूप में दिखाते हैं।
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Pages:39-41
How to cite this article:
डॉ. रीता शुक्ला "गोदान में नारी चरित्र". National Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 1, Issue 4, 2016, Pages 39-41
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